गुस्ताखी की सजा:सामने वाले फ्लैट में ताकाझांकी करते अर्चित को डॉक्टर की बीवी से प्यार हो गया, एक दिन उसका भांडा फूटा
मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है।” अर्चित अपनी धुन में मग्न गुनगुना रहा था। उसे एहसास भी नहीं हुआ कब जय ने पीछे से आकर उसकी पीठ पर मुक्का जड़ दिया।
उसे गालियां देता हुआ अर्चित पलटा। अच्छा-खासा मूड खराब हो चुका था।
"क्या हमेशा बेवक्त टपक जाता है। दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद यही तो रिलैक्स करने का टाइम होता है।"
"यह रिलैक्स करना नहीं, विशुद्ध ठरक है, बदतमीजी है, प्राइवेसी का हनन है, कानूनन अपराध है।"
बस, अब एक शब्द और निकाला मुंह से तो दांत तोड़ दूंगा।" अर्चित अच्छा खासा तप गया। खिड़की बंद करके वह बेड पर ढेर हो गया।
अर्चित पॉश सोसाइटी में मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के पांचवें फ्लोर पर रहता था। यूं तो उसमें कोई बुरी आदतें नहीं थीं, पर एक चस्का लग गया था। अपने हाई रिज़ॉल्यूशन टेलिस्कोप को सेट करके सामने के अपार्टमेंट्स में रहने वालों की ताक-झांक। पहले उसने यूं ही टाइमपास के लिए शुरू किया, फिर मजा आने लगा और अब लत लग गई।
जबसे उसका वर्क फ्रॉम होम शुरू हुआ, उसे सामने वाले हर फ्लैट के हर मेंबर की रूटीन याद हो गयी। किस कमरे में क्या रखा है, यह तक। हालांकि हमेशा ही मजा आए, ऐसा नहीं होता था। थर्ड फ्लोर वाले गुप्ताजी सुबह-शाम तोंद पर हाथ फेरे बत्तीस अलग-अलग प्रकार के पानी से गरारे करते, वह भी भिन्न-भिन्न जानवरों की आवाज में।
लेकिन उनकी कॉलेज में पढ़ रही बेटी पिंकी उसके तुरंत बाद बालकनी में बाल सुखाने आती। कभी-कभी दोनों आगे-पीछे आते, कभी साथ में, इसलिए सहना पड़ता।
फोर्थ फ्लोर वाले शर्माजी का ग्यारहवीं में पढ़ने वाला टीन एज लड़का पिंटू, पिंकी में इंटरेस्टेड था, जो कि उसकी ट्यूशन टीचर भी थी। इस जानकारी का फायदा उठाकर वह पिंटू को ब्लैकमेल करके अपने काम निकलवाता रहता।
वर्मा जी का लड़का किताबों में सिगरेट छिपाकर टैरेस पर फूंकता, उसी से छीनकर उसकी भी सिगरेट का इंतजाम हो जाता।
पर सबसे अच्छा लगता था उसे उसकी खिड़की के जस्ट सामने वाले फ्लैट में रहने वाला कपल। बेहद प्यारी, मासूम सी बीवी, हैंडसम हसबैंड और गोलू मोलू सा सुर्ख सफेद न्यू बोर्न बेबी। एकदम आइडियल फैमिली।
उसने पता लगाया कि पति नवीन डॉक्टर था, पत्नी हाउस वाइफ थी। रोज सुबह से उठकर बीवी ब्रेकफास्ट बनाती, इसी बीच बेबी के भी जागने का टाइम हो जाता, कभी उसको फीड कराना, कभी किचन में भागना, कभी बेबी को सुलाना, कभी साथ लिए घूमना, जल्दी-जल्दी टेबल सेट करना, फिर शाही अंदाज में नवाब साहब उठकर आते, उनकी हर चीज- सूट, बैग, जूते, घड़ी, हाथ में थमाना, सी ऑफ करना। फिर दिन भर घर में कुछ न कुछ करते ही रहना। छोटे बच्चे को संभालना, रात में भी जागना, पर पति का हर काम हरदम मुस्कुराकर करना।
‘काश! ऐसी बीवी मिल जाए, जीवन सफल हो जाए।’ वह हमेशा सोचता।
लेकिन धीरे-धीरे अर्चित को लगने लगा कि यह आइडियल फैमिली इतनी भी आइडियल नहीं है। पति टिपिकल भारतीय मर्द है। पति का परमेश्वर बने हुक्म चलाते रहना और बीवी का हर आदेश का पालन करना। उसे आश्चर्य होता कि इन लोगों के यहां कोई नौकर क्यों नहीं है। ये तो बच्चे की देखभाल के लिए नैनी भी लगवा सकते हैं।
अक्सर रात को रोते बच्चे को कंधे से लगाए थपकियां देते वह बालकनी से आसमान तकती रहती, उस समय अर्चित को लगता, काश वह कुछ मदद कर पाता, थोड़ी देर बच्चा संभाल लेता या उसके लिए एक कप चाय ही बना देता।
“कैसा बाप है। अपनी नींद में मजाल है कि खलल पड़ जाए। बच्चा क्या उस बेचारी ने अकेले पैदा किया है या बस उसी की जिम्मेदारी है।” वह गुस्से में कुढ़ते सोचता।
अर्चित को उससे हमदर्दी होने लगी। लेकिन वह कर भी क्या सकता था। मन ही मन वह खुद को इस परिवार का हिस्सा मान बैठा।
वह औरत उसकी कुछ न लगते हुए भी बहुत कुछ बन गई। उसे खुद नहीं समझ आता कि यह रिश्ता क्या कहलाता है। एक तरफ वह औरत, जिसकी पूरी दुनिया बस उसका पति और बच्चा है, जिसे किसी तीसरे के वजूद का पता ही नहीं है और दूसरी तरफ अर्चित, जिसे उसका नाम भी नहीं पता, फिर भी उसका चौबीस घंटे का रूटीन पता था। उसकी फिक्र थी, उसे देखना जिंदगी का अहम काम था।
लेकिन उसके दोस्त जय को उसकी यह आदत बिल्कुल पसन्द नहीं थी। वह अक्सर उसे समझाता कि वह किसी दिन मुसीबत में भी पड़ सकता है। न भी पड़े तो ये अच्छी आदत नहीं है। लेकिन अर्चित पर इसका कोई असर न होता।
यह सोच गांव में तेरे भी भाई-भाभी हैं। सोच कैसा लगेगा, अगर कोई छिछोरा पूरा समय तेरी भाभी पर ऐसे नजर रखे…”
“चटाख…” जय की बात पूरी होने से पहले ही अर्चित का भारी हाथ उसके गालों पर निशान छोड़ चुका था।
“यह थप्पड़ तूने मुझे नहीं, खुद को मारा है। थोड़ी भी गैरत बाकी हो तो छोड़ दे यह सब।" कहता हुआ जय फिर वहां रुका नहीं।
अर्चित जानता था कि ये सच बात थी, शायद इसीलिए उसे आईना दिखाने पर इतना बुरा लग गया था। जय उस दिन के बाद से नहीं आया, पर उसकी बातें असर कर गईं।
अब अर्चित को अपराधबोध होने लगा, जो पहले नहीं होता था। फिर भी वह दिल के हाथों मजबूर होकर कभी-कभी देख लिया करता था। हां, बाकी घरों की ताकाझांकी बंद कर दी थी। उसे यह भी पता चला कि उसका नाम नीतू है।
फिर कुछ दिनों बाद सबका अटेंशन खींच लिया सोसाइटी में आई नई किरायेदार ने। उम्र की तीसरी दहाई में चल रही, मिडिल एज पर वेल मेंटेन, सिंगल महिला। लोगों में सुगबुगाहट होने लगी। जरूर बहुत अमीर और पावरफुल है, तभी अकेली औरत को फ्लैट रेंट पर मिल गया। पर यहां क्या करने आई है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान, सबको आंखें सेंकने का बहाना मिल गया।
माइक्रो स्कर्ट और क्रॉप टॉप या स्पेगेटी ब्लाउज पर साड़ी पहने जब वह निकलती, सबकी निगाहें दूर तक उसी का पीछा करतीं। अर्चित को तो इसमें महारत हासिल थी ही। उसका नया 100x ज़ूम फोन अब उसी की तस्वीरों से भरा रहने लगा। उसके बेडरूम से लेकर वॉशरूम तक फोकस कर रखा था। वह उस औरत के प्रति आकर्षित नहीं था। बस जिज्ञासा थी और यह गर्व कि वह औरों से ज्यादा जानता है उसके बारे में।
फिर एक दिन अर्चित जैसे करंट खाकर कुर्सी से उछल पड़ा, जब उसने नई किरायेदार की बालकनी में डॉक्टर नवीन को देखा।
"यह यहां क्या कर रहा है, इसे तो हॉस्पिटल में होना चाहिए था इस समय।" दोनों में एकदम बेतकल्लुफी साफ नजर आ रही थी। जैसे काफी समय से जानते हों। फिर उस औरत ने डॉक्टर नवीन का कॉलर खींचकर उसे रूम में लिया और गेट बंद कर लिया।
अर्चित मुट्ठियां भींचे कमरे में चकरा रहा था। उसका मन कर रहा था चीख-चीखकर पूरी सोसायटी को इकट्ठा कर ले और उन दोनों को पीटते हुए बाहर घसीट लाए।
बस समस्या वही थी। किसी से क्या कहता, वह सबकी जासूसी करता है, कैमरा से वीडियो और फोटो लेता है। उसी के जेल जाने का खतरा था।
अब नीतू से उसकी सिम्पथी और बढ़ गई। वह सीरियसली उसकी मदद करना चाहता था। दो-तीन बार बाहर वह टकरा भी गई, लेकिन उसकी हिम्मत न हुई। उसके लिए तो अर्चित अजनबी ही था।
आखिर करीब महीने भर बाद वह हिम्मत करके, उन दोनों के फोटो प्रिंट करके नीतू के दरवाजे के नीचे सरका आया और बेल बजाकर भाग गया। साथ ही एक लेटर में लिख दिया कि वह खुद देखना चाहे तो अभी अपनी आंखों से देखकर आ सकती है।
भागकर आने और आगे क्या होगा, इसकी उत्सुकता से उसकी धड़कनें बेतहाशा बढ़ गईं, सांस फूलने लगी।
उसने फिर से टेलीस्कोप और फोन कैमरा का ज़ूम तैयार किया। उसने देखा कि नीतू अपने पति को रंगे हाथों पकड़ चुकी है और तीनों में बहस हो रही है। सबसे बुरी बात, उस औरत ने नीतू पर लातों, थप्पड़ों की बारिश कर दी, और तो और डॉक्टर ने भी दो-तीन तमाचे जड़ दिए और अब उसके बाल खींचकर उसे बाहर घसीट रहा था। अर्चित के पास गन होती तो खिड़की से ही निशाना साधकर उन दोनों की खोपड़ी उड़ा देता।
थोड़ी देर बाद ही उसने देखा कि नीतू अपने घर में, अपनी अलमारी में कुछ ढूंढ रही है। बच्चा रो रहा है, वह ध्यान नहीं दे रही, खुद भी रो रही है। फिर उसने एक सूती साड़ी निकाली और स्टूल लाकर पंखे से फंदा बांधने लगी। अर्चित को फिर करंट लगा और इस बार सब भूलकर वह बिजली की तेजी से उसके घर भागा।
जब डॉक्टर नवीन घर पहुंचा तो अजब मंजर था। अर्चित नीतू के दोनों हाथ पकड़े कुछ समझा रहा था और वह रोए जा रही थी। उसने बिन कुछ कहे दोनों को धक्का मारकर घर से निकाल दिया और गेट बंद कर दिया।
उधर अर्चित के फ्लैट पर कुछ होश बहाल होने पर नीतू उस पर फट पड़ी।
"क्या जरूरत थी मुझे बचाने की और तुम हो कौन, मैं तो तुम्हें जानती तक नहीं। क्यों लाए हो मुझे यहां?"
"मैं तो तुम्हें अच्छे से जानता हूं। इस टाइम तुम बेबी की मसाज कर रही होतीं।"
फिर अर्चित ने अपनी शर्मिंदगी परे रखकर उसे सारी बात बता दी।
बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। अब सुनो। मैं सिर्फ बीस साल की हूं। डॉक्टर साहब मुझसे बीस साल बड़े हैं। बारहवीं की पढ़ाई के दौरान दौरान पापा के इलाज के लिये इनके हॉस्पिटल आई थी। हम बेहद गरीब थे। तभी इन्होंने पापा से मेरा हाथ मांगा। मुझमें सुंदरता के अलावा कोई गुण नहीं था। पापा तो निहाल ही हो गए। मैं भी बहुत खुश थी। लगा, आगे पढ़ने का मौका मिलेगा। हमारी शादी के एक महीने बाद ही पापा चल बसे। मैंने कॉलेज में एडमिशन के लिए कहा तो इन्होंने कहा, इन्हें बच्चा चाहिए। उम्र हो रही, अब और लेट नहीं कर सकते। बच्चे के बाद मैं पढ़ सकती हूं।
मैंने इनकी हर बात मानी। खुद को समर्पित कर दिया पूरी तरह। लेकिन आज मुझे पता चला, ये तो पंद्रह साल से शादीशुदा हैं। वह औरत इनकी बीवी और बहुत बड़े बिजनेसमैन की बेटी है। इनका बंगला यहां से कई किलोमीटर दूर है। फ्लैट तो बस मेरे लिए लिया था। कई कई दिन इसीलिए बाहर रहते थे। इनको बच्चा चाहिए था। सरोगेसी या दूसरे उपायों में खर्च करने के बजाय इन्हें एक गरीब लड़की आसान चारा दिखी।
मेरी शादी तो लीगल भी नहीं, कहीं रजिस्टर्ड भी नहीं। मुझ में सब-कुछ था। लंबी-पूरी, मजबूत, छरहरी काया, कम उम्र, सुंदरता। इनका पहले प्लान था, बच्चा होते ही उसे मरा हुआ बताकर मुझसे अलग कर देना, लेकिन डॉक्टर होने के नाते पता था कि मां का दूध छह महीने जरूरी है। छह महीने पूरे होने आए तो इनकी पत्नी का धैर्य जवाब दे गया। इसलिए पति की जासूसी के लिए यहां शिफ्ट हुई थीं। इससे पहले कि ये लोग सोच पाते, मेरा क्या करना है, तुमने इनका भंडाफोड़ कर दिया।" कहकर नीतू दोनों हाथों में मुंह छिपाकर फूट फूटकर रो दी।
अर्चित भी शॉक्ड था। उसे तो बस पत्नी की प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के टाइम पतियों के दूसरी जगह मुंह मारने वाला सामान्य मामला लगा था। पर यह तो बड़ी साजिश थी।
कुछ टाइम मौन छाया रहा। फिर अर्चित ने जैसे ठोस फैसला लिया।
"मेरा यह काम चाहे नैतिकता के पैमाने पर कितना ही गलत था, लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने एक मासूम जिंदगी बरबाद होने से बचा ली। शायद यही मेरा प्रायश्चित है। अगर तुम्हारी शादी लीगल नहीं है तो हम कोर्ट में अपनी शादी के लिए अप्लाई कर देते हैं। तुम कॉलेज में एडमिशन लेकर ग्रेजुएशन पूरा करोगी। तुम्हें समझ आ ही गया है, आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है। तब तक हम इन क्रिमिनल्स से निपटने का रास्ता भी खोजेंगे। क्या तुम्हें कोई ऐतराज है?
यह मत समझना मैं तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठा रहा हूं। तुम्हें मुझे जानने समझने का टाइम चाहिए या मैं पसंद ही नहीं, तो भी तुम्हारे लिए कोई सेफ शेल्टर तलाश करूंगा। प्रॉमिस है।"
"जिस कंडीशन में मैं हूं, कोई डिमांड नहीं रख सकती। एक दिन में मेरी दुनिया सिर के बल उलट गई। गृहस्थी उजड़ गई। बेटा छिन गया। लेकिन दूसरी तरफ, जान बच गई। समझ नहीं आता क्या करूं। बस इतना जानती हूं कि तुम फरिश्ता बनकर आए हो। तुम्हें ठुकराना बेवकूफी होगी। बस मुझे थोड़ा टाइम दो।"
"जितना चाहे उतना लो। टाइम भी तुम्हारा, मर्जी भी तुम्हारी, मैं भी तुम्हारा।" अर्चित खुश था, जिस पल उसने ऐसी बीवी की कामना की थी, शायद वह दुआ क़ुबूल होने की ही घड़ी थी। संजोग इसी को तो कहते हैं।






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