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छत्तीसगढ़ के विद्रोह

 आइए दोस्तों हम छत्तीसगढ़ के बस्तर मे हुवे विद्रोह के बारे में जानते हैं

            जो cgpsc exam की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं,जिससे हर वर्ष प्रश्न पूछे जाते हैं


 # लिंगागिरी विद्रोह (1856-

1857 ईस्वी ):-




लिंगागिरी का अर्थ किसी तालुका से होता था उस समय मे।

इस विद्रोह को बस्तर का महामुक्ती संग्राम कहा जाता है

शासक: 

जब लिंगागिरी का विद्रोह हुुआ तब उस समय बस्तर का राजा भैरमदेव थे।

नेतृत्व:

लिंगागिर विद्रोह का का नेतृत्व धुर्वा राम माडिया के द्वारा किया गया था, जो बस्तर का तालुकदार था।

कारण:

जब अंग्रेज बस्तर के भोले भाले आदिवासियो पे शोषणकारी नीति चलाते थे, तब आदीवसीइन सब से तंग होके इन शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध विद्रोह करते है।अपने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए।

परिणाम:

इस विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि 5 मार्च 1856 को धुर्वा राम माडिया को अंग्रजों ने फांसी दे दिया।

इस प्रकार धुर्वा राम माडिया छत्तीसगढ़ के दुसरे शहीद हुए।


# कोई विद्रोह ( 1856 ईस्वी)

शासक:

कोई विद्रोह भी राजा भैरमदेव के शासन काल में हुआ था।

नेतृत्व:

कोई विद्रोह का नेतृत्व नांगुल दोरला (फोतकेल के जमींदार) के द्वारा, भोपालपट्टनम के जमींन दार राम भोई और भेजी के जमींदार जुग्गाराम के साथ मिलकर किया था।

कारण :

जब अंग्रेजो के द्वारा साल वृक्ष को काट कर ठेकेदारों को बेचा जाता था, तब साल वृक्षों के कटाई पर रोक लगाने के लिए, साल वृक्षों को बचाने के लिए इसके विरुद्ध यह विद्रोह चलाया गया था।

इस विद्रोह का एक नारा भी था

नारा: एक साल वृक्ष के पीछे एक सिर।

अर्थात जो एक साल वृक्ष भी काटेगा उसका सिर काट दिया जाएगा।

परिणाम:

इस विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि कैप्टन ग्लासफर्ड ( सिरोचा के डिप्टी कलेक्टर) द्वारा हार स्वीकार किया गया आदिवासियो को इस विद्रोह में जीत मिली। साल वृक्ष की कटाई को रोक दिया गया।

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