तुम वफादार नहीं:
शादीशुदा होते हुए भी वह पड़ोसी की बीवी अनुपमा की खूबसूरती देखकर बहक गया, मीता को इसकी खबर नहीं थी
पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय’ ये जानते हुए भी मेरा दिल, हमारे सामने वाली बिल्डिंग में रहने वाले भट्टाचार्य की पत्नी अनुपमा पर आ गया था। लाख कोशिशों के बावजूद भी नजर वहां से हटती ही नहीं थी।
पिछले बुधवार के दिन हम इस बिल्डिंग में शिफ्ट हुए थे। मैंने ऑफिस से फ्राइडे की छुट्टी ले ली ताकि हम शनिवार को इत्मीनान से पूरा दिन अपना सामान सैट कर लें और इतवार को आराम करने का मौका मिल जाए। फिर सोमवार के दिन ऑफिस जाने से मन एकदम तरोताजा और हल्का रहेगा।
हमारा अपार्टमेंट दूसरी मंजिल पर था। एक बड़े से अहाते में 6 बिल्डिंग्स एक-दूसरे के इतनी करीब थीं कि अगर सामने की बिल्डिंग के किसी अपार्टमेंट में जाना हो, तो एक छलांग लगा कर आसानी से पहुंचा जा सकता था।
बुधवार के दिन मैं ट्रक पर सामान लदवा कर ले आया। घर में पहुंचते ही हम दोनों में मतभेद शुरू हो गया। मीता सबसे पहले किचन सेट करना चाह रही थी और मैं अपनी स्टडी। किताबें अलमारी में रखने के बाद मैं पलंग एक तरफ रख कर सैट कर ही रहा था, तभी सामने वाले अपार्टमेंट में एक महिला की झलक सी दिखायी दी। ध्यान से देखने पर वो बेहद सुंदर और किसी मूर्ति की तरह लग रही थी। मेरे दिल में उसे दोबारा देखने की तमन्ना जागी। इस बीच पंद्रह-बीस मिनट बीत गये। काम कम हो रहा था, ताक झांक ज्यादा हो रही थी।
अचानक मीता चाय लेकर कमरे में दाखिल हुई। उसकी पेशानी पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। चाय का मग मेरे सामने बढ़ाकर वो दुपट्टे से पसीना पोंछने लगी। मैंने उसकी तारीफ में एक जुमला गढ़ा, “भई, यकीन नहीं हो रहा कि इतनी जल्दी चाय भी बन गयी? बड़ी तलब हो रही थी।”
“अब हुई न आपको हमारी कद्र… इसीलिए तो मैं आपसे कह रही थी कि हम दोनों मिलकर पहले किचन सैट कर लें, लेकिन आपको तो पहले बेडरूम की फिक्र हो रही थी जैसे…”
मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा, “तुम्हारी कद्र मैंने कब नहीं की?”
हाथ छोड़िए… कोई देख लेगा… सारी खिड़कियां खुली हुई हैं… सामने वाले फ़्लैट का पूरा अंदरूनी नजारा यहां से दिखता है… इसी तरह से हमारा घर भी उन्हें दिखता होगा।”
“दिखता है तो दिखने दो,” मैंने रोमांटिक अंदाज में कहा, “मेरे पास कुछ देर तो बैठो…”
“बैठने का नहीं काम का वक्त है,” मीता तुनक कर बोली, “पूरा घर सेट करना है। वैसे आप इतनी देर से कर क्या रहे थे?”
मीता कमरे में सामान रखवाने में मेरी मदद करने लगी। इस दौरान मैंने कितनी बार बहाने से उधर झांका। अनुपमा को देखने की मन में एक तड़प सी उठ रही थी, लेकिन वो फिर नजर नहीं आयी। अलबत्ता एक अधेड़ उम्र की एक बदसूरत नौकरानी जरूर दिखाई दे थी।
इस बार मीता ने भी मेरी चोरी पकड़ ली। उसने मेरी तरफ घूरते हुए सवाल किया, “आप बार बार सामने क्यों ताक-झांक कर रहे हैं?”
“ताक-झांक कहां कर रहा हूं? मैं तो ये देख रहा हूं कि सामने वालों ने रेशमी पर्दे क्यों लगा रखे हैं, बेपर्दगी होती है। कम से कम पर्दे खींच कर तो रखें।”
“ये तो उनकी मर्जी है। आजकल लोग जानबूझ कर घर की सजावट की नुमाइश करते हैं, ताकि लोगों पर उनका रुआब पड़े,” मीता बोली।
दोपहर तक हम दोनों पति-पत्नी ने मिलकर सामान सेट कर दिया। बाकी काम अगले दिन पर करने के लिए कह कर मीता नहाने के लिए चली गयी। मैं बेडरूम में बैठा बच्चों से बातें कर रहा था कि दिल धक्क से रह गया। अनुपमा गुलाबी सलवार कमीज में सलीके से कटे हुए बालों को धीरे-धीरे सहलाती हुई किसी से बातें कर रही थी। उसका खूबसूरत चेहरा मुझे अपनी आंखों से दिल में उतरता हुआ महसूस हो रहा था।
मैं उसे जी भर कर देख भी नहीं पाया था कि वो बातचीत खत्म करके अपने कमरे में चली गई। कनखियों से इधर-उधर देखा, तो पता चला कि वो लोग कहीं बाहर जा रहे हैं। अनुपमा को करीब से देखने की इच्छा दिल में जोर पकड़ने लगी।
मैं हांफता हुआ लिफ्ट की ओर दौड़ा। खुशकिस्मती से अनुपमा गज भर की दूरी से मेरे करीब से महकती और मुझ पर एक सरसरी नजर डालती गजगामिनी जैसी चाल से कार पार्किंग की ओर बढ़ गयी।
हारे हुए जुआरी की तरह अपने फ़्लैट पर वापस लौट आया। उस समय मीता नहाकर अपने लंबे लहराते बालों को कंघी कर रही थी। नीली बॉर्डर वाली साड़ी और सफेद ब्लाउज में उसकी सांवली रंगत और निखर आयी थी। इस सबके बावजूद मुझे मीता में न कोई सुंदरता नजर आ रही थी, न ही कोई आकर्षण। अनुपमा जैसी ही औरत मेरे लिए आइडल थी।
मैं शादी भी अनुपमा जैसी ही गोरी रंगत वाली लड़की से करना चाहता था, लेकिन रिश्ता जुड़ा मीता के साथ। पांच-छह साल में वो दो बच्चों की मां बन गई तो शरीर भी थुलथुल हो गया। मीता को मैंने अपने हिसाब से ढालने की पुरजोर कोशिश की। मैं चाहता था कि वो बाल कटवा ले। बढ़िया मेकअप करे। मैं ऑफिस से वापस लौटूं तो सज-संवर कर मेरा स्वागत करे। लेकिन उसे सजने-संवरने, मेकअप और फैशन करने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी। घूमने-फिरने की बजाय उसे घर के काम करना अच्छा लगता था। पता नहीं उसे हर समय खाना बनाने और घर के काम करने में क्या मजा आता था।
एक दिन मीता ने बताया कि आज उसने अनुपमा और भट्टाचार्यजी को चाय पर इनवाइट किया है। पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बना कर रखने की इस मुहिम में उसकी ये पहल काबिले तारीफ थी।
दरवाजा मीता ने खोला। मुझे उस वक्त मीता के कपड़े देखकर बहुत गुस्सा आया। मेककप तो दूर चेहरे पर पाउडर भी नहीं लगाया था उसने।
धड़कते दिल से मैं ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ा। पूरी टेबल टेस्टी स्नैक्स से सजी हुई थी। अनुपमा प्याजी रंग की साड़ी में बेहद खूबसूरत दिख रही थी। ऐसा लगा जैसे वो ब्यूटी पार्लर से मेकअप और बाल सेट करवा कर आई है।
उस दिन के बाद से इन दोनों महिलाओं के बीच ‘किचन डिप्लोमेसी’ शुरू हो गयी। मीता अच्छी-अच्छी डिशेज बनाकर उन्हें भेजती। अनुपमा कभी फ्रूट चाट, सलाद या उबले अंडे ही भेजती थी। शायद इससे ज्यादा उसे कुछ पकाना आता ही नहीं था। मैं हमेशा से यह चाहता था कि जिंदगी में कुछ रंगीनी हो, नयापन हो। इस सब में मेरे हित में ये बात थी कि अनुपमा जो भी बनाती थी, हमारे घर खुद लेकर आती थी। इस बहाने थोड़ी देर के लिए ही सही मुझे उसे करीब से देखने का मौका मिल जाता था।
अनुपमा के वापस लौटने के बाद मैं अपनी कल्पना में उसके साथ नैनीताल, मसूरी से लेकर दुनिया के कई मुल्कों की सैर कर आता। सपने में वो अपनी नाजुक उंगलियों से कभी मेरे बाल सहलाती, कभी नई-नई रेसिपी बनाकर अपने हाथों से मुझे खिलाती। मौका मिलते ही मैं उसकी उंगली काट लेता और जैसे ही वो चीखती मेरी नींद खुल जाती। ऑफिस से वापस लौटने के बाद मैं उसे नजर भर देखने के लिए कभी एक खिड़की, कभी दूसरी खिड़की पर जाकर खड़ा हो जाता।
एक दिन मैंने बच्चों और मीता को उसकी मम्मी के पास छोड़ दिया। वापसी में भी वो अकेली आने वाली थी। उस दिन जब मैं ऑफिस से लौटा तो लगभग रात हो चुकी थी। मैंने कार पार्क करके सोचा क्यों न अनुपमा के घर चला जाऊं। मीता की गैर मौजूदगी में अनुपमा के करीब रहने का मौका मिल जाएगा।
दरवाजा बाहर से खुला हुआ था, लेकिन अंदर अंधेरा था। ऐसा लगा, जैसे वो लोग बाहर निकलते समय दरवाजा बंद करना भूल गए थे। दरवाजा धकेल कर मैं अंदर पहुंच गया। आवाज इसलिए नहीं हुई क्योंकि पूरे घर में कालीन बिछे हुए थे। उस घुप अंधेरे में अचानक मेरी नजर सामने वाले अपने फ़्लैट पर पड़ी। मुझे हैरानी हुई कि मीता घर में मौजूद है और घर के काम निपटा रही है। वो शायद जल्दी ही लौट आयी थी।
तभी मेरी नजर भट्टाचार्य के पलंग पर जुगनू की तरह चमकती रोशनी पर गयी। भट्टाचार्य सिगरेट का कश लेते हुए सामने कुर्सी पर बैठी हुई एक आकृति को संबोधित करता हुआ बोला, “यार दिनेश, बीबी हो तो मीता जैसी। मैं अक्सर तुम से इसी औरत के बारे में बात करता रहता हूं। इसकी सांवली रंगत में जो निखार है न, वो अनुपमा के गोरे रंग और तीखे नाक नक्श में नहीं है। गौर से देखो- सादगी में उसका रूप कितना सम्मोहक नजर आ रहा है।”
“औरत की असली सुंदरता होती है सुघड़ता में, खूबसूरती में नहीं।”
दिनेश ने भी भट्टाचार्य की हां में हां मिलाई, “कितनी बार मैंने अनुपमा को समझाया है कि मीता की तरह सादगी से रहे। ताश पार्टी, किटी पार्टी, होटलबाजी में समय बर्बाद करने के बजाय घर के काम काज में मन लगाए, पर वो सुनती ही नहीं है।”
“लगता है, तुमने बहुत करीब से मीता को देखा-परखा है”
“हां, मैं जानता हूं, किसी के घर में ताक-झांक करना बुरी हरकत है। लेकिन क्या करूं, दिल के हाथों मजबूर हूं। काश, मुझे भी मीता जैसी पत्नी मिली होती।”
पुरुषों के चेहरे के अंदर एक चेहरा और छिपा होता है। अक्सर पुरुष खूबसूरत महिला को देखते ही बहक जाते हैं। मैं भी बहक गया था। भूल गया था कि सप्तपदी के अनुसार, दूल्हा अपनी दुल्हन को पत्नी मानने के अलावा प्रतिबद्ध और वफादार रहने का वादा भी करता है। फिर मैं मीता जैसी पत्नी मिलने के बावजूद किसी विशाल रेगिस्तान में खड़ा हुआ एक चश्मे की तलाश में मरीचिका के पीछे क्यों भाग रहा था?









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