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फिर से मोहब्बत का एहसास

 दिल फिर से फिसल गया:सूरज के जाने के बाद अजय ने उस पर ऐसा जादू किया कि उसने खुद प्यार का इजहार कर दिया

“आज मैंने उसे फिर एक बार देखा। बस की खिड़की से झांकती मेरी नजरें उसका काफी देर तक पीछा करती रहीं। पर फिर एक बार वह किसी जादूगर की तरह हवा में घुल गया। उसकी वह जादुई मुस्कान उफ! उसकी वह सुनहरे बालों में हाथों को घुमाने की आदत, उसकी बेफिक्र चाल… मानो हर दुख, हर पीड़ा को जूतों तले रौंदता कुचलता जा रहा हो। उसके पास हर समस्या का समाधान होता था और अगर न भी हो तो उसके पास थी हर समस्या का मखौल उड़ाने की असीम शक्ति।


अरे, यह क्या हो रहा है। कहीं मैं फिर एक बार इसके प्यार में तो नहीं पड़ रही या शायद उसके जादुई प्रेम की अनुभूति से मैं कभी बाहर ही नहीं आई। हमारा दिमाग भी कभी कभी कंप्यूटर की तरह काम करता है। कोई एक तस्वीर सामने आती है तो पूरी फिल्म दिखाने लगता है।

मुझे मेरे जीवन का वह समय याद आ गया जब सूरज को जुड़े मुझे बस एक साल हुआ था। सूरज वह था जिसके बिना मैं जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। सूरज हमारी शादी के साल भर के भीतर ही एक दुर्घटना में चल बसा। सूरज के साथ मेरी हंसी, खुशी, जीने की इच्छा सब स्वाहा हो गया। वह सपने जो मैंने और सूरज ने मिलकर देखे थे वे मुझे डराने लगे थे।


सूरज की मृत्यु ने मुुझे अकेला तो कर ही दिया था, पर लोगों के दूसरी शादी के आग्रह ने जीना दूभर कर दिया था। जीवन मुझे कभी न खत्म होने वाले मृत्युदंड सा लगने लगा था और इस सजा से भागने के लिए मैं सूरज का शहर छोड, एक ऐसे शहर में आ गई जहां मुझे कोई नहीं जानता था।

यहां मुझे एक छोटी-मोटी नौकरी भी मिल गई। जिंदगी एक लंबे विराम के बाद फिर एक बार चल पड़ी, पर मैं पूरी तरह से बदल गई, न किसी से दोस्ती, न किसी से बातचीत… मेरा दिन घर से ऑफिस और ऑफिस से घर में ही बीतता।



आए दिन मैं बिना किसी वजह के किसी न किसी का अपमान करती रहती थी। मैंने अपने आप को किसी यंत्र की तरह बना लिया था। ऐसा जीवन किसी सुलगती माचिस सा मुझे तिल तिल जला रहा था।

उस दिन भी मैं किसी बात से नाराज-परेशान ऑफिस जाने के लिए बस में बैठी। तभी देखा एक बड़ा ही अस्त-व्यस्त सा लड़का बस में चढ़ा और देखते ही देखते बड़ी बेतकल्लुफी से मुझे धक्का देते हुए मेरे साथ आकर बैठ गया।

मैंने तीन-चार बार अपनी तीखी नजरों से आग बरसाते हुए उसकी ओर देखा, पर वह तो किसी और ही लोक में था। फिर मैंने बड़े गुस्से से उसे धक्का मारा और जमीन पर गिरा दिया। पूरी बस उस पर हंस रही थी और मैं उसे अनदेखा कर खिड़की के बाहर देख रही थी।



वह उठा और फिर अपनी जगह पर बैठ गया। मेरा दिमाग उस समय घूम गया जब उसी लड़के को मैंने अपने ऑफिस में काम करते हुए देखा। मैं उससे दूर ही रहती। जितना हो सके उसे नजरअंदाज करती।

हफ्ते भर बाद वह बस में फिर से मेरे पास आकर बैठ गया और अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए बोला, “हेलो, मेरा नाम अजय है… और आपका?”

मैंने माथे पर शिकन लाते हुए उसे जवाब दिया, “आपसे मतलब?”

वह हंसने लगा और बोला, “बड़ा अजीब नाम रखा है आपके माता-पिता ने आपका।”

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। मैं उसे नोंच लेना चाहती थी। पर मैंने किसी तरह अपने गुस्से को काबू में करते हुए उससे कहा, “देखो मिस्टर, हर कोई यहां तुम्हारे जितना खुश नहीं है, तुम्हारी बातें मुझे परेशान करती हैं। मैं अपनेआप में बहुत खुश हूं। आगे से मेरे सामने आने की जुर्रत भी मत करना…समझे।” मैं उसका अपमान करके खुद पर इतरा रही थी। सोच रही थी अच्छा सबक सिखाया, अब कभी मेरे पास भी नहीं फटकेगा।


दूसरे दिन मैं ऑफिस पहुंची तो अजय मेरी मेज पर पहले से ही मौजूद था। वह बोला, “अब तबियत कैसी है तुम्हारी? कल तो कुछ ज्यादा ही गरम थीं तुम। चलो, कॉफी पीने चलते हैं, तुम्हें अच्छा लगेगा।”


मैंने गुस्से से आंखें बंद कर लीं और वह बड़बड़ करता रहा। उसने मेरा पीछा तब तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने उससे बात नहीं की। अब चाहे अनचाहे ही मुझे उसकी बकबक सुनते हुए बस में उसके साथ ही ऑफिस आना-जाना पड़ता।

मेरा इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि धीरे-धीरे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदल रहा था। मैं बदल रही थी। अपने आप को नए सिरे से पाने की कोशिश कर रही थी। मैंने फिर से मुस्कुराना शुरू कर दिया था।

एक लंबे समय के बाद मैंने फिर से पेंटिग बनाना भी शुरू कर दिया था। मुझ पर जबरदस्ती थोपी गई यह दोस्ती अब मुझे कुछ-कुछ अच्छी या शायद बहुत अच्छी लगने लगी थी। अब मैं सजने-संवरने भी लगी थी। मैं कुछ महसूस कर रही थी… शायद जो सूरज के लिए करती थी वही।


मैंने सोचा कि अब एक दिन भी न गंवाए मैं अजय को बता दूंगी। मैं और अजय ऑफिस कैंटिन में खाना खा रहे थे। मैंने कुछ चोर आवाज में कहा, “अजय सुनो, मुझे तुमसे कुछ कहना है…”

अजय ने जादुई आंखों को ऊपर उठाया और कहा, “हां बोलो।”

कुछ देर तो मैं उसकी आंखों में देखती रही, फिर होश संभालते हुए मैंने कहा, “अजय… मैं तुम्हें पसंद करने लगी हूं… शायद पसंद से थोड़ा ज्यादा… क्या हम इस रिश्ते को आगे बढ़ा सकते हैं?”


अजय ने फिर एक बार अपनी जादुई आंखों से मुझे देखा और कहा, “सुनो, मैं तुम्हारी भावनाएं समझता हूं और यह भी नहीं कहूंगा कि वह एकतरफा हैं। हां, मैं भी तुम्हारे लिए महसूस करता हूं… पर जरा सोचो, तुम फिर एक बार अपनी जिंदगी को, अपनी खुशियों को किसी से बांध रही हो… जैसा कि तुमने सूरज के साथ किया था।

मैं चाहता हूं तुम किसी से ऐसा सतही प्रेम न करो कि उसकी अनुपस्थिति तुम्हें जड़ से उखाड़ कर रख दे। किसी से दिल की गहराइयों से प्रेम करना मतलब उसमें एकरूप हो जाना… चाहे वह शरीर से साथ हो या न हो… उसका स्पर्श, उसका साथ जीवन में हमेशा उत्साह भरता रहे, न कि तुम्हें उजाड़ दे। और ऐसा प्रेम किसी और से करने के लिए पहले तुम्हें खुद से प्रेम करना होगा। अपने आप को, अपने जीवन को पूर्णता की ओर ले जाना होगा। अपनी खुशियों को, अपने जीवन को किसी और में ढूंढना बंद करो।

मैं भी तुमसे प्रेम करता हूं, पर मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारी खुद को ढूंढने की इस यात्राा में मेरा हमेशा तुम्हारे साथ रहना बाधक होगा। तो पहले तुम अपनी खुशियों को, अपने भीतर के प्रेम को अच्छे से खुद में पा लो। फिर हम दोनों जरूर मिलेंगे अपनी-अपनी पूर्णताओं के साथ।

मैं यहां ऑडिट के काम से आया था जो एक-दो दिन में पूरा हो जाएगा। हम दोनों के पास एक दूसरे फोन नंबर है, हम बात करते रहेंगे… और मिलेंगे भी, पर हम दोनों की खुशियां एक दूसरे पर निर्भर नहीं रहेंगी।”

उसकी बातें जैसे मुझ पर कोई जादू-टोना कर रही थीं। पहली बार मुझे लगा, जीवन अनंत आकाश की तरह फैला हुआ हैं। मुझे बंधा हुआ महसूस नहीं हो रहा था।

मुझ पर जादू की छड़ी घुमाने वाला यह था मेरा जादूगर।











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