मनहूस होने के ताने सुनती करिश्मा को करण से प्यार हुआ, लेकिन उसका अतीत फिर सामने आ गया
4 घंटे पहले
"मनहूस, मनहूस, मनहूस..."
यह शब्द था या जलता अंगारा, जो उसकी त्वचा को बींधता, उसकी आत्मा से जाकर ही चिपक गया था। वह कितना ही नोंच-खरोंच लेती, लहूलुहान हो जाती, यह खुरचकर निकलता ही नहीं था।
"शायद मेरे वजूद के साथ ही जलकर भस्म होगा अब यह।" सोचकर वह घुटनों में सिर दिए फूट फूटकर रो दी।
“प्यार में बहुत ताकत होती है, किस्मत बदल देती है।" किसी ने कान में सरगोशी की।
"नहीं नहीं, किस्मत बहुत ताकतवर है, प्यार छीन ले जाती है।” वह चीखी, लेकिन आवाज अंदर ही घुट गई।
"बिटिया खाना तैयार है।"
"जी आई।" उसने जल्दी-जल्दी आंसू पोंछे और वॉशरूम में घुस गई।
पहली बार यह शब्द छह महीने की उम्र में उससे जुड़ा था। जब वह माँ की गोद में सुकून से सो रही थी, एक बेकाबू ट्रक उनकी कार को रौंदते हुए निकल गया था। बड़ी मुश्किल से कटर से काटकर बॉडी बाहर निकाली गई थीं, पर चमत्कारिक रूप से वह बच गई थी।
उसके ननिहाल में बस बूढ़ी नानी थीं इसलिये कस्टडी इकलौती बुआ के पास गई, जिसे वह फूटी आँख नहीं सुहाती थी।
"काश! यह मनहूस भी साथ ही मर गई होती। मेरे भाई को तो खा ही गई। पहले इसकी गरीब मां ने मेरे सीधे सादे भाई को फंसाया, फिर यह डायन अपने मां-बाप को खाकर हंसती हुई बाहर निकल आई। इसका मनहूस साया मैं अपने बच्चों पर नहीं पड़ने दे सकती।"
बिन किसी की परवाह किये बुआ ने उसे सर्वेंट क्वार्टर में शिफ्ट कर दिया था, अपनी नौकरानी के साथ। नौकरानी को भी उससे कोई हमदर्दी नहीं थी। इसी तरह दिन बीत रहे थे। उस मासूम में तो इतनी समझ भी नहीं थी, क्यों वह दिन भर भूखी प्यासी, गीली नैपी में पालने में पड़ी रहती है। दो तीन बार दूध की बोतल मुंह से लगा दी जाती। एक दिन उसके पिता के वफादार मैनेजर ने साल भर की बच्ची पर नौकरानी को हाथ छोड़ते देखा, उनकी आत्मा कांप गई। हड़बड़ी न करते हुए उन्होंने बाकायदा वीडियो बनाया, बुआ का रवैया देखा बच्ची के साथ और पूरे सबूत-गवाहों के साथ पुलिस में शिकायत की और उसको गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की। निःसंतान दम्पति को वह ईश्वर का वरदान ही लगी थी। उसे वह इस शहर से बाहर ले गए और उसका नाम रखा करिश्मा।
उसका जिंदा बचना वाकई करिश्मा ही तो था। वह बेहद सुलझी, समझदार, शांत, और प्रतिभावान बच्ची थी। रूप और गुण माँ के ही पाए थे। उसकी मोहिनी सूरत और स्नेहिल स्वभाव सबको अपना दीवाना बना लेता था।
अपनी बुद्धि और प्रतिभा के बल पर उसने देश के प्रसिद्ध मैनेजमेंट कॉलेज में एडमिशन पा लिया था। लेकिन हर रिवायती अभिभावक की तरह उसकी शादी की चर्चा भी घर में उठने लगी थी। कई बेहतरीन रिश्ते थे, पर करिश्मा के मन को जीता था करण ने। उसी की यूनिवर्सिटी में उसका सीनियर था, अलग फेकल्टी में। कभी बात भी नहीं हुई थी, लेकिन उसकी पर्सनैलिटी ऐसी थी कि भीड़ में अलग नज़र आता था। लम्बा-चौड़ा डील-डौल, गहरी शहद रंग आँखें जिनसे ज़हानत झलकती थी, धीर-गम्भीर, चेहरे पर बुद्ध सी शांति, सौम्य, सुंदर। कोई तपस्वी सा लगता था। दोनों कहीं भी हों, उनकी आँखें एक-दूसरे को तलाश ही लेती थीं।
उस दिन बारिश बहुत तेज़ थी और करिश्मा परेशान हो गई थी, उसकी दोस्त मोनिषा आज जल्दी चली गई थी, वे लोग कार पूलिंग करती थीं। बारी-बारी एक-दूसरे की कार में आती थीं कॉलेज। मोनिषा को कुछ काम आ गया तो वह अपनी कार भी ले गई। अब इस अचानक की बारिश में वह बस स्टॉप तक कैसे पहुँचे। मई के पहले हफ़्ते में कब इतना पानी बरसता है। तभी करण की कार उसके पास आकर रुकी। बिन कुछ कहे करिश्मा ने फ्रंट गेट खोला और आकर बैठ गई।
मैं इंटर्नशिप के लिये कैनबरा जा रहा हूँ। साल भर से पहले न लौट पाऊँ शायद। तब तक तुम्हारा भी लास्ट सेम कम्प्लीट हो जाएगा। अब चूंकि तुम्हें ऐतराज़ नहीं है तो अपने मम्मी-पापा को तुम्हारे घर भेज दूं?"
करिश्मा पहले तो एकदम चौंक गई, उसे उम्मीद नहीं थी कि करण पहला जुमला ही यह बोलेगा। फिर बेक़ाबू धड़कनों को संभालकर गहरी साँस ली और मुस्कुराकर कहा- "अगर तुम्हें ऐतराज़ न हो तो, ऐसा पूछा जाता है।"
"अगर तुम बैक डोर खोलकर पीछे बैठतीं, तो यही पूछता। लेकिन चूंकि तुमने फ्रंट डोर चुना, मतलब मेरा साथ नागवार तो नहीं।" वह भी मुस्कुराया।
इस तरह एक सादे से फंक्शन में दोनों की सगाई हो गई और वह चला गया। सगाई और शादी के बीच का अरसा ऐसा होता है, जैसे परीक्षा के बाद परिणाम आने से पहले का अरसा। अपना ही रोमांच होता है, डर, ख़ुशी, भविष्य की उम्मीद।। उसके भी सपनों को पंख लग गए थे।
तभी एक हादसा हुआ, उससे फोन पर बात करते ड्राइव करने में करण का ध्यान थोड़ा भटका और उसका एक्सिडेंट हो गया। शुक्र था कि ज़्यादा चोट नहीं आई, बस हाथ में फ्रेक्चर हुआ।
कुछ दिन बाद करण की माँ के स्कूल की अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग भरभराकर गिर गई। वे बाल-बाल बचीं। फिर करण के पिता को बिज़नेस में बड़ा लॉस हो गया।
एक दिन उन्होंने करिश्मा को कॉफी शॉप में मिलने बुलाया। वह बड़ी ख़ुश दिली से उनसे मिली। उसके फूल से खिले चेहरे को देखकर एकबारगी तो उनके मुँह से शब्द नहीं फूटे। फिर ख़ुद को संभालकर उन्होंने कहना शुरू किया-
"देखो बेटा, मुझे गलत मत समझना। तुम मुझे बिल्कुल अपनी बेटी जैसी प्यारी हो। पहले मैं शगुन-अपशगुन, शुभ-अशुभ में नहीं मानती थी। पर जबसे तुम्हारी सगाई हुई है, हमारे घर पर एक के बाद एक मुसीबत आ रही हैं। जबसे तुम्हारे अतीत का पता चला है, मन वहम से भर गया है। मैं जानती हूँ करण मेरी बात नहीं मानेगा। पर करण मेरा इकलौता बेटा है, अगर उसे कुछ हो गया तो हम लोग जी नहीं पाएंगे। मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ।" कहते हुए वे रो पड़ीं।
प्लीज़ मम्मी.... सॉरी आँटी...आप परेशान मत होइए।" वह इतना ही कह सकी। अपने आँसू रोकना मुश्किल हो रहे थे। उसे करण से कोई तूफ़ानी इश्क़ नहीं हुआ था, लेकिन सगाई के बाद से उसने आने वाली ज़िन्दगी के कई सपने बुन डाले थे और अब वह उसे अपनी जान से प्यारा हो चुका था। सच में कहीं उसे कुछ हो गया तो, "नहीं नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दे सकती।" उस समय वह दिमाग़ से नहीं, दिल से सोच रही थी। उसने एक नज़र अपनी उंगली में जगमगाती उसके नाम की अंगूठी पर डाली और ख़ामोशी से उतारकर उन्हें सौंप दी। तकलीफ़ इतनी हुई, मानो उंगली ही काटकर दे आई हो।
इस हादसे के बाद उसके आई-बाबा उसकी शादी को लेकर सच में परेशान हो गए। अभी तक उन्होंने सोचा ही नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है। अब दिन रात उनको यही चिंता सताने लगी। करिश्मा का मन हुआ कई बार कि उनसे कह दे, वह एक शानदार करियर बनाने पर फोकस करना चाहती है, शादी नहीं, पर जानती थी कि इससे वे और परेशान ही होंगे। इसलिये उसने सब-कुछ उन पर और क़िस्मत पर छोड़ दिया।
जल्द ही एक बड़े बिज़नेसमैन के घर से उसके लिये रिश्ता आया। इस बार आई-बाबा देर नहीं करना चाहते थे, इसलिये दो महीने बाद ही शादी की डेट फिक्स कर दी।
पर कुछ ऐसा हुआ कि शादी से ऐन पंद्रह दिन पहले लड़के वालों ने रिश्ता तोड़ दिया।
करिश्मा तो वैसे ही समझौते के तहत शादी कर रही थी, पर उसके आई-बाबा को गहरा सदमा लगा था। अब उन्होंने सोच लिया था कि जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करेंगे। पूरी तसल्ली से ही बात तय करेंगे। इससे करिश्मा को भी राहत मिली थी।
साल भर गुज़र चुका था। उसका प्लेसमेंट एक मल्टीनेशनल कंपनी में हो गया था। उसकी आई अब बीमार रहने लगी थीं और उनका उदास चेहरा उसे दुःखी कर देता था।
"कभी कभी मुझे लगता है मोनिषा कि मैं मर ही जाऊँ। दुःख के सिवा कुछ नहीं दे रही मैं आई बाबा को। सच में मनहूस हूँ।" वह रो रही थी और मोनिषा अपनी इस प्यारी सी दोस्त को दुःख से देख रही थी। वही उसकी एकमात्र हमराज़ थी। और आज वही उसकी परेशानी का हल लेकर आई थी।
"मेरी भाभी बनोगी?"
क्या मतलब?"
"मेरा भाई राहुल तुमको पसन्द करता है। हम लोग यह सब वहम और बकवास मानते भी नहीं हैं। सबसे बड़ी बात, जब मन करे शादी का, तब करना। साल, दो साल, तीन साल, कोई जल्दी नहीं है। कम से कम तुम्हारे पेरेंट्स तो टेंशन फ्री हो जाएंगे।"
पहले वह उस पर भड़कना चाहती थी कि उसे किसी के एहसान की ज़रूरत नहीं। कोई बोझ नहीं, जो उतारा जाए, पर मोनिषा की बात उसे जँच गई। शादी की कोई जल्दी नहीं थी और घर पर सबको सुकून भी रहता।
आज वह बेमन से वह मोनिषा के साथ मॉल आई थी और उसे फ़ूड कोर्ट में बिठाकर ख़ुद वॉशरूम चली गई थी।
उसे अचानक लगा कि उसकी आँखों को धोखा हुआ है। लेकिन धोखा कैसे हो सकता था। उसे तो वह हज़ारों की भीड़ में पहचान सकती थी। पूरे तीन साल बाद करण उसके सामने था लेकिन यह वह करण तो नहीं था, जिसे वह जानती थी। लम्बे, बिखरे बाल, बढ़ी शेव, आँखों के नीचे पड़े गड्ढे।
"हैलो। कैसी हो?" उसी मेहरबान मुस्कान के साथ उसने कहा और चेयर खींचकर बैठ गया।
"ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं।"
"ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता, वही एक शख़्स था जहान में क्या।"
करण प्लीज़.."
"बोलने दो मुझे। क्या हमारा रिश्ता इतना कमज़ोर था, तुमने एक बार बात करना भी ज़रूरी नहीं समझा।"
"मुझे डर था, बात की तुमसे तो इरादा कमज़ोर पड़ जाएगा।"
"पड़ जाने देतीं।"
"अपनों को दुःखी करके हम ख़ुश नहीं रह सकते थे करण।"
"तो क्या अब ख़ुश हैं?"
"ज़िन्दा तो हो कम से कम।"
"इसे ज़िन्दगी कहते हैं तो मैं मरना पसन्द करूँगा।"
करिश्मा ने घबराकर उसके होठों पर हाथ रख दिया। "ऐसा मत बोलो।" उसकी आँखों से आँसुओं की धारा फूट पड़ी थी।
तभी मोनिषा वापिस आ गई। करिश्मा एकदम हकबका गई।
"तुम जैसा सोच रही हो, वैसा कुछ नहीं है। हम तीन साल बाद आज ही मिले हैं। टच में भी नहीं थे।" वह सफ़ाई देने लगी।
"लेकिन हम टच में थे। पिछले तीन साल से।" मोनिषा इत्मीनान से बैठ गई थी।
"मेरे भाई से इंगेजमेंट का आइडिया भी करण का ही था।"
अब वह कुछ हैरत और कुछ नाराज़गी से करण को घूर रही थी।।
"यह लुक मत दो। मेरी माँ ने तुम्हारा दिल दुखाया था। मैं सच्चे दिल से चाहता था तुम ख़ुश रहो। लेकिन तुम्हारी दूसरी सगाई टूटने के बाद सच में परेशान हो गया था। तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, दुबारा खोने का रिस्क नहीं लेना था, घरवालों को भी समझाना था, इसलिये मोनिषा की हेल्प ली।
माँ को समझ आ गया, मेरा एक्सीडेंट भयानक भी हो सकता था, शायद तुम्हारी दुआओं की वजह से बच गया। स्कूल की बिल्डिंग मम्मी पर भी गिर सकती थी, पर ऐन टाइम पर वे हट गईं, जान बच गई, यह तो अच्छा ही हुआ न।
मेरी छोटी बहन ने भागकर शादी कर ली। उसका बॉयफ्रेंड पापा की कम्पनी में ही था और कबसे उन्हें चूना लगा रहा था। बिज़नेस में लॉस उसी वजह से हुआ था। हम चाहते तो हम दोनों भी शादी कर लेते पर मेरी ख़ातिर मेरी माँ के एक बार कहने पर तुमने उनकी बात मान ली। इतनी प्यारी बहू उन्हें कहाँ मिलेगी।
दरअसल यह सब फ़ितूर तुम्हारी बुआ ने सबमें भरे हैं। बचपन में एक तो तुम्हारी कस्टडी छिनी, जिससे तुम्हारे पापा की प्रॉपर्टी उनके हाथ से निकली साथ ही सज़ा के साथ बेइज़्ज़ती अलग। इसलिये वे हर जगह जाकर तुम्हारे बारे में अफ़वाहें फैलाती थीं। मोनिषा से जब यह सब बकवास की, तब पता चला। ख़ैर अब चूंकि तुमको ऐतराज़ नहीं है तो कल ही मेरी मम्मी तुम्हारे आई बाबा से मिलने आएंगी और इसी हफ़्ते हमारी शादी है।"
"एक मिनट, मुझसे तो कुछ पूछा ही नहीं। कैसे पता तुम्हें कि मुझे ऐतराज़ नहीं।"
"तीन साल से तुम्हारे हर पल की ख़बर है मेरी जान।" करण ने उसका हाथ थाम लिया।
आज फिर मई का पहला हफ़्ता था और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। आज फिर करण के नाम की वही अंगूठी उसकी उंगली में हक़ से जगमगा रही थी।
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धनयवाद दोस्तों



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