प्यार ने उलझा दिया:रघु नहीं जानता था कि जिस सुंदर लड़की का जिक्र उसका दोस्त शिवम करता था वही उसकी बीवी है l
पिछले तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था। आसमान बादलों की दौड़भाग से परेशान था, तभी तो उठा-उठा कर नीचे फेंक रहा था इन्हें और ये हवा से फूट-फूटकर धरती पर बिखर रहे थे।
आज दस वर्ष बाद शिवम आया था। अपने साथ क्या क्या ले गया… मैं उस इंसान की तरह गिरा जा रहा हूं, जिसके सिर पर दस बरस तक दस मन बोझ रखा हुआ हो।
सुबह से शाम तक मैंने हलक में शराब की दो बोतलें उड़ेल ली हैं, लेकिन शराब को भी न जाने क्या हो गया है। आज मेरी शायरी कहां चली गयी? मेरे मूड को क्या हो गया? कोई मेरे पास नहीं है। मीनाक्षी भी नहीं। दूसरे पलंग पर रजाई में दुबकी सुबह की नींद का आनंद ले रही है।
कितनी शांति है उसके चेहरे पर। उसे रत्तीभर भी अंदेशा नहीं है कि उसने अपने दहकते हुए इस मासूम सुंदर चेहरे की आग में किसी की पूरी जिंदगी तबाह कर डाली है।
आंखें खोलकर मैं पंद्रह साल पहले की जिंदगी की हर याद को सामने देख पा रहा हूं। मेरे साथ मेरे दोनों बच्चे सो रहे हैं और मेरी पत्नी मीनाक्षी दूसरे पलंग पर अकेली सो रही है।
मैं हमेशा उस से दूर ही रहता हूं। कभी कुछ देर के लिए उसे अपने पास बुलाता भी हूं तो मेरी कल्पना में कोई और औरत होती है। उस वक्त मैं सोच सोच कर ईर्ष्या की आग में जलने लगता हूं कि वो भी इस समय किसी दूसरे पुरुष की बाहों में कैद होगी।
उसी समय मैं मीनाक्षी को खुद से अलग कर देता हूं और अपनी सिसकियों को अपने कंठ में दबा कर सोने के बहाने ढूंढने लगता हूं।
शादी के कुछ समय बाद ही मीनाक्षी इस भेद को समझ गयी थी। उस वक्त वो मेरे बालों पर हाथ फेर कर अपना चेहरा मेरे कंधे पर टिकाकर कहती, “कभी मुझे भी तो बताइए कि वो कौन थी? आजकल कहां है?”
उस रात हम दोनों पूरी रात जागे। मैं उसकी याद में और मीनाक्षी मेरा साथ देने के लिए। मीनाक्षी का हाथ मेरे हाथ में होता और उसके खुले बाल मेरे आंसुओं से भीग जाते। मुझे हैरानी होती कि मीनाक्षी मुझे छोड़ कर क्यों नहीं चली जाती? किस उम्मीद में मेरे साथ रह रही है।
उसकी इसी बात ने मुझे इस रिश्ते में घेरे रखा और शादी के चार साल में ही मैं दो बच्चों का पिता बन गया। हालांकि मेरा दिल अभी तक कुंआरा था। मैंने अपनी चाहत, अपनी प्यास, अपनी मुहब्बत को अभी तक दिल में छुपा कर रखा था।
शायद पुरुष का स्वभाव ही ऐसा होता है वो कभी भी अपने इश्क के धंधे में अपनी पत्नी को शामिल नहीं करता, वो तो रोटी सब्जी की तरह जिंदगी की एक जरूरत बन जाती है। उसकी पूर्णता तो सदा महबूबा से होती है। वो अनकही भावना, वो बेनाम सी तड़प, दिल की वो गिरहें, जो किसी के चाहने से खुल जाती हैं, मेरे दिल में बंद पड़ी थीं और मैं, पुरवा में दुखने वाले जख्म की तरह यादों के घाव समेटे बैठा था। एक ऐसे दुख को, जो सिर्फ मेरा था। मुझे कुछ याद नहीं ये किस्सा कब शुरू हुआ।
उन दिनों मैं पहली बार कॉलेज आया था। मां हर समय बादशाहों की तरह मुझ पर निगरानी रखतीं। और पापा? पापा कहते थे कि लड़कों का काम सिर्फ ये है कि दिन रात आखें किताबों में लगाये रखें।
मैं भी अपनी इसी जिंदगी से समझौता कर चुका था, मगर कॉलेज में शिवम क्या मिला, मैंने मां के सारे आदेश दिमाग से निकाल फेंके।
वो बड़ा ही बातूनी और बेबाक था। कॉलोनी की लड़कियों को देखकर बेझिझक सीटियां बजाता, उनके नाक नक़्श और अदाओं का जिक्र करके मोहब्बत के नारे लगाता। हालांकि उसकी बातें सुनकर मुझे शर्म तो बहुत आती, मगर कोई अनजानी कशिश मुझे उसके करीब खींच कर ले जाती।
एक दिन हम दोनों कॉलेज जा रहे थे कि अचानक शिवम ने कहीं ऊपर देख कर कहा, “खड़ी है, ऊपर देख। ओह, अब तो अंदर चली गयी।”
“कौन थी वो?” मैंने ऊपर देखते हुए पूछा।
“क्या बताऊँ। बस ये समझ सुंदरता की अद्भुत मूरत। अच्छा ये बता, तुझे शायरी आती है?”
“बस थोड़ी-थोड़ी। दरअसल पापा अच्छी शायरी करते हैं।”
“हमें ऐसी वैसी शायरी नहीं चाहिए। काश, कोई शायर उसे देख ले।”
“किसे?” मैंने डरते डरते उससे पूछा।
“अरे उसी परी को। क्या रंग-रूप है! चेहरा मोहरा तो ऐसा जैसे ईश्वर ने बड़ी फुर्सत में गढ़ा हो” वो बड़ी शरारत से मेरी ओर देखने लगा।
मेरे तो न जाने हाथ पांव ठंडे होने लगे। घर लौटा तो घबराहट सी महसूस होने लगी थी। मैंने खाना नहीं खाया और आंखें बंद करके लेट गया। दो कजरारी आंखें और रसीले होंठ मेरे बिल्कुल करीब आ जाते और मैं यह सोचकर कांप जाता कि कहीं मां मेरे खयालों की आवारगी को पढ़ न लें।
उस दिन शाम को जब मैं घर से बाहर निकला तो उसी जगह खड़ा होकर इधर उधर देखने लगा। एक अधेड़ उम्र की महिला बालकनी में आयी और सब्जियों के छिलके फेंक कर भीतर घुस गयी, दो बच्चे लड़ते लड़ते आगे बढ़ गए। ऊपर देखते देखते मेरी गर्दन दुख गयी। ढीले ढाले कदमों से मैं घर लौट आया।
शिवम मुझे अक्सर बताता रहता, “आज तो वह गुलाबी कपड़े पहने हुए थी।”
“चलो देखें,” मैं उत्सुकता वश उसके साथ हो लेता।
“वो जो कुर्ती बालकनी की रस्सी पर झूल रही है न उसी की है।”
“इतनी पतली कमर… कैसी नाज़ुक होगी।”
बिस्तर पर लेट कर मैंने सोचा। सीने में हल्का हल्का सा दर्द होने लगा। मैंने उसे अभी तक देखा नहीं था, लेकिन दिल और दिमाग से मैं पूरी तरह उसी का हो चुका था।
“हंसते वक्त उसके गालों में गड्ढे पड़ जाते हैं, जी चाहता है पर लग जाएं और उसके पास पहुंच जाऊं।”
फिर कुछ सोचकर शिवम बोला, “रघु सुन, वो वुमन पॉलिटेक्निक में पढ़ती है। सीमा से उसकी बड़ी दोस्ती है। किसी दिन सीमा से मिलने के बहाने वहां पहुंच जा और उस से मिल ले।”
उसने सीमा से भी कहा, “उस सुंदर सी अप्सरा की एक झलक रघु को दिखा दे। बेचारे का दिल उस की कल्पना ही में धड़कता रहता है।”
“तुम दोनों अपना आपा खो चुके हो,” सीमा ने गुस्से से कहा। “वो बड़ी शरीफ़ लड़की है। अगर उसे यह बात मालूम हो गयी, तो सच कहती हूं बेचारी बदनामी के डर से जहर खा लेगी।”
विद्या चली गयी तो मेरे पांव मन मन भर के हो गए। नजरों के पीछे से दिखने वाली उस अलौकिक हस्ती पर मैं दिलो जान से कुर्बान हो गया। कई चक्कर इस उम्मीद पर मैंने पॉलिटेक्निक कॉलेज के भी लगाये कि कहीं नजर भर उसे देख सकूं।
आज सोचता हूं कि वो कैसी मोहब्बत थी जब रोमांटिक नॉवेल और फिल्मों ने मेरी उठती जवानी को इस रूमानी अंदाज मे रंग दिया था जिस से निकलना मुश्किल था। यादों के बादल हर वक्त छाए रहते। फिर अचानक कहीं से अंधियारी सी आ जाती और मुझे कुछ सुझायी ही नहीं देता। आज भी जब बिजली चमकती है, बादल गरजते हैं, तो दिल दहल जाता है। रजाई में मुंह छिपा कर दुबक जाता हूं।
मेरी पांच वर्ष की बेटी हंस हंस कर कहती है, “पापा आप बिजली से डरते हैं” उसे क्या मालूम मैं किस किस से डरता हूं?
मैं इंजीनियर बन गया। इसी के साथ शायर भी। मेरी बहनों ने आग्रह किया कि मैं अपने लिए कोई लड़की तलाश करूं,मगर मैं उसे कहां ढूंढूं? अब तो वो बालकनी भी खाली हो चुकी थी।
एक दिन मेरी बहन ने फैसला सुना दिया, “हमने आपके लिए लड़की देख ली है, एकदम गोरी चिट्टी, हजारों में एक। हंसती है तो गालों में गड्ढे पड़ते हैं। गुलाबी कपड़ों में बिल्कुल गुलाब की कली सी लगती हैं।”
ये विशेषताएं मेरी बहनों ने मेरी नज़्मों से खोजी थीं। मेरी पत्नी अच्छी खासी सुंदर थी। अब मेरी तृष्णा और बढ़ गयी। अगर वो मिल जाती तो... मेरी कल्पना में अभी तक वो थी। मुझे अपने बच्चे उसकी गोद में ठुमकते हुए नजर आते। उसे याद करने के लिए मैंने शायरी की और अब भुलाने के लिए शराब का सहारा लिया। सुबह से शाम तक ऑफिस और शाम के बाद क्लब की ‘बार’ में... मीनाक्षी ने मुझे थामना चाहा।
पहले अपनी शक्ल सूरत से फिर अपनी ख़िदमत और प्यार से। फिर मायूस होकर उसने खुद को घर के काम काज में व्यस्त कर लिया। मैं हमेशा उसकी तरफ पीठ करके ही सोता रहा। लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी कोई फ़रमाइश या शिकायत नहीं देखी।
और आज… दस बरस बाद जब शिवम आया तो उसके उन्हीं कहक़हों और रौनकों से दरो दीवार चहक उठे। वैसा ही तेज़तर्रार। उसने छह-सात लड़कियों से इश्क़ किए, फिर एक अजनबी लड़की से शादी भी कर ली।
शिवम को देखते ही मेरे सब्र का पैमाना छलक उठा। जी में आया उससे लिपट कर खूब रोऊँ। वो ही तो मुझे इस आग में धकेल कर गया था।
मेरा उदास चेहरा और आसुओं में डूबी आंखें देखकर उसने पूछा, “कहो यार, अपने उस अफलातून इश्क़ का अंजाम क्या रहा?”
जब तक मैं कुछ कहता मीनाक्षी ने स्नैक्स की ट्रे कमरे की टेबल पर रखी और वापस लौट गयी। शिवम ने उसे ध्यान से देखा, फिर एकदम उछल पड़ा, “तो ये बात हुई। यार, तू तो हमारा भी उस्ताद निकाला।”
“क्यों, क्या हुआ?”
“तो तूने बना डाला उस रूपसी, सुंदर कन्या को अपनी बीबी। ला यार, मिला दोस्ती वाला हाथ।








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