रंगभरा प्यार
:गुलाबी बाजार में शादी के सपने सजा रहे विभा-नरेन नहीं जानते थे कि कुछ पल में उनकी जिंदगी में भूचाल आएगा
गुलाबी बाजार’… एक लंबी-सी सड़क के शुरू होने से पहले एक बोर्ड लगा था। गुलाबी रंग से उस पर ये अक्षर अंकित थे। हंसी आ गई उसे बोर्ड देखकर। “तुम मुझे कैसे-कैसे रास्तों पर ले आते हो? सब कितना अनोखा है यहां।”
मुझ पर विश्वास करती हो न?”
“यह कैसा सवाल है? पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा। जो प्यार के मायने सिखा दे, जो प्यार करना सिखा दे, उस पर विश्वास कैसे नहीं करूंगी?” कहते-कहते उसके गाल गुलाबी हो गए थे। अनगिनत गुलाबी सपने तारों की तरह उसके आसपास टिमटिमाने लगे थे।
“जिस भी रास्ते पर ले जाओगे, उसे ही अपनी मंजिल मान साथ चलूंगी तुम्हारे,” वह बोली।
“तो इस समय गुलाबी बाजार की रौनक देखो। मैं हमेशा तुम्हारे गालों पर ऐसी ही सुर्खी देखना चाहता हूं। तुम्हारी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं,” वह मुस्कराया।
उस सड़क के दाएं-बाएं दोनों ओर एक ही आकार की दुकानें थीं। सब पर टंगे बोर्ड भी समान आकार के थे। ऐसा लगता था मानो सड़क की सीध को एक मायने देने के लिए ये दोनों ओर एक कतार में सजी दुकानें किसी गुत्थी को सुलझाते हुए सारे मापदंडों को दुरुस्त किए सजी हैं।
जयपुर पिंक सिटी है, पर गुलाबी बाजार… यह तो जयपुर में भी नहीं है। एक नामालूम से शहर के एक शांत इलाके में स्थित है। जहां शाम को चहल-पहल अपने तमाम रंगों के साथ उतर आती है, खासकर गुलाबी रंगत के साथ। दुकानों का रंग गुलाबी है, बाहर लटकी साड़ियों, दुपट्टे, ओढ़नी, सलवार, कुरते, परांदों का रंग गुलाबी है। बाजार प्यार की दावतें देता महसूस होता है।
वह उसका हाथ थामे चल रही है इसी गुलाबी बाजार में। उसकी आंखों में ढेर सारे गुलाबी सपने हैं। ये सपने उसके प्यार के कारण ही तो पल रहे हैं उसके भीतर। वह बहुत प्यार करता है उससे और वह भी तो दिलोजान छिड़कती है उस पर।
“जानती हो विभा, यह इश्क करने वालों को बाजार है। यहां आकर प्यार करने वाले गुलाबी सपनों को बटोरकर ले जाते हैं और उनसे अपना आशियाना सजाते हैं। इसीलिए तुम्हें यहां लाया हूं। मुझे भी सजाना है तुम्हारे साथ ऐसा ही एक सुंदर आशियाना जिसमें आकाश से उतर परियां गीत गुनगुनाएं। ऊपर आसमान से ताकते सितारे हमें देख ऐसे शरमाएं कि उनकी चमक से हमारी जिंदगी रोशन हो जाए।”
“शायर नहीं हो, पर बातें कहते नहीं, शेर पढ़ते लगते हो, इंजीनियर साहब! कहां से बटोरते हो ऐसे अल्फाज?” विभा ने पूछा। उसका मन कर रहा था कि इसी समय नरेन की बांहों में सिमट जाए।
“तुमसे ही तो सीखा है शायरी करना। ‘मैं शायर तो नहीं, मगर ऐ हसीं जब से देखा तुझको, मुझको शायरी आ गई…’ अच्छा बताओ क्या खरीदोगी?” एक दुकान के सामने खड़े हो उसने पूछा। “लहंगा-चोली या चौड़े पांयचे वाली कढ़ाईदार सलवार और कुरता? जैसा ढीला-ढाला कुरता तुम्हारी मां पहनती है, मेरी जटनी।” नरेन ने उसे छेड़ा।
नहीं, मुझे तो चटक गुलाबी रंग की साड़ी लेनी है नरेन।”
“मैंने सोचा तुम अपने पारंपरिक परिधान ही पहनना चाहोगी शादी में।”
“पारंपरिक परिधान तो पहनूंगी, पर तुम्हारे रिवाजों के अनुसार। वैसे भी मुझे साड़ी बहुत अच्छी लगती है। पल्लू का कभी लहराना तो कभी सिर पर प्यार से बिछ जाना… बहुत ही शायराना लगता है वह अंदाज तब साड़ी का। मुझे जटनी कहते हो, तुम्हें क्या कहूं? बिहारी बाबू?”
“चाहे जो कहो, मुझे तुम्हारे मुंह से सब कुछ सुनना अच्छा लगता है। लेकिन विभा, मैं तुम पर कोई दबाव नहीं डालना चाहता। जैसा तुम चाहोगी हम वैसे ही शादी कर लेंगे। तुम कहोगी तो हम तुम्हारे रीति-रिवाजों से ब्याह कर लेंगे। तुम्हें ऐतराज न होगा तो मंदिर में जाकर बस सात फेरे ले लेंगे। मेरे लिए सिर्फ तुम मायने रखती हो, रस्मो-रिवाज नहीं,” नरेन ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा। उसका स्वर भीगा हुआ था।
“मेरे लिए भी नरेन तुम ही सब कुछ हो। सात फेरे तो बस दुनिया के लिए लेने हैं, मैं तो बंध चुकी हूं तुमसे हमेशा के लिए। इसलिए ज्यादा मत सोचो। देख लेंगे क्या करना है। वैसे भी इस गुलाबी बाजार में लाकर तो तुमने जैसे मेरे एहसासों में भी गुलाबी सुरूर भर दिया है। कितना कुछ है खरीदने को यहां।”
गुलाबी रंग की साड़ियां, ओढ़नी, दुपट्टे, चूड़ियां, बिंदी, परांदे, चांदी की पायल और सिंदूर की डिब्बी…न जाने क्या-क्या खरीद लिया था विभा ने। बैग पकड़े वे लौट रहे थे। शाम की रौनक जुगनू की तरह अपनी चमक बिखेर रही थी। दोनों को पता था कि उनका रिश्ता उनके परिवारों को पसंद नहीं है। पता नहीं कौन उच्च है कौन नहीं… लेकिन जाति के नाम पर लड़ना सदियों से हो रहा है। लेकिन वे तैयार हैं इस लड़ाई के लिए और जीत कर ही रहेंगे। आखिर प्यार को कौन हरा पाया है। चाहे कुछ हो जाए उन्हें कोई जुदा नहीं कर सकता है।
तभी सड़क पर तेजी से दौड़ती मोटरसाइकिल उनके सामने आकर रुक गई। उसके पीछे-पीछे एक कार भी अपने पहियों को रगड़ती वहां शोर मचाती ठहरी। मानो बाजार की रौनक में जलजला पैदा करने आए हों। विभा और नरेन अपने गुलाबी सपनों के साथ हाथों में हाथ डाले बेफिक्र से चलते-चलते चौंक गए। उनके कदमों पर मानो पहरे लग गए हों। मोटरसाइकिल सवार ने नरेन को खींचा। कार से उतरकर एक हट्टे-कट्टे नौजवान ने विभा को घसीटा।
“भाई छोड़िए,” विभा चीखी।
“भैया छोड़िए,” नरेन चिल्लाया।
“चुप!” दोनों के कठोर स्वर निकले।
“घर चल। वरना यहीं काट कर फेंक दूंगा। कल ही तेरा ब्याह करवा दूंगा। चाहे किसी बूढ़े को ही क्यों न लाकर खड़ा करना पड़े। बस हमारी जाति का होना चाहिए।”
“तो यही सही। मार दीजिए मुझे। पर मैं नरेन के सिवाय अब और किसी के साथ शादी नहीं करूंगी। आखिर क्या बुराई है उसमें?” विभा सड़क पर बैठ गई।
“मैं तेरी ही नहीं, तेरे इस आशिक की भी जान ले लूंगा। तू ही समझा इसे, वरना जान गंवा बैठा देगा अपनी भी और इसकी की भी,” विभा के भाई ने गरजते हुए नरेन से कहा।
नरेन खुद को छुड़ाने की कोशिश करता बोला, “विभा को खरोंच भी नहीं आनी चाहिए। मेरे साथ चाहे जो कर लो।”
पर यह क्या?
नरेन फिर चुपचाप मोटरसाइकिल के पास जाकर खड़ा हो गया। जैसे वह जाने को तैयार हो। विभा अवाक अभी भी सड़क के खुरदुरेपन को महसूस करती वहीं बैठी थी। उसके गालों पर सुर्खी नहीं थी। नरेन उसे यूं बीच राह में छोड़कर जा रहा है? विभा का विश्वास डगमगाया। जाना ही था तो क्यों लाया था इस गुलाबी बाजार में उसे? क्यों भरे थे उसने उसकी आंखों में एहसासों के गुलाबी सपने? दोनों तरफ सजी दुकानों पर स्याह रंग उतरता महसूस हुआ उसे! सपने तो स्याह ही होते हैं, तभी तो उन्हें रात में देखा जाता है। वे गुलाबी आखिर कैसे हो सकते हैं? फिर विभा ने अपने मन में आने वाले तमाम ख्यालों को झटका। वह नरेन पर अविश्वास आखिर कैसे कर सकती है?
उसने नरेन की ओर देखा। उसकी आंखों में प्यार और आश्वासन दोनों थे। वह समझ गई उसके इशारे… उसकी आंखों की भाषा… ‘अभी जाओ। इस समय इन दोनों के सिर पर खून सवार है। मैं तुम्हारी जान खतरे में नहीं डाल सकता।’
लेकिन विभा सड़क से उठी नहीं। उसका भाई लगातार उसे खींच रहा था। अचानक नरेन उसके पास आया। उसने बैग में से गुलाबी साड़ी निकाली जिसके किनारों पर सुनहरे तार झिलमिला रहे थे और उसे लहराते हुए विभा को उढ़ा दिया। साड़ी का पल्लू आकर उसके सिर पर बिछ गया। विभा ने लपेट लिया साड़ी को अपने से। वह उठी और लिपट गई नरेन से।
उन दोनों पर लगातार वार हो रहे थे। गुलाबी बाजार उन दो प्रेमियों के प्यार का साक्षी बन उनकी आंखों में दर्द की गुलाबी सुर्खी भरता जा रहा था। सिर पर लाठी का प्रहार हुआ, दोनों सड़क पर गिर गए।
एक-दूसरे का हाथ थामे… गुलाबी साड़ी का पल्लू लहराया और दोनों के बेजान होते शरीर को ढक लिया।
और इस तरह बस एक धर्म और जाति के नाम पर दो प्यार करने वालों को सरेआम मार डाला गया ।
क्या धर्म और जाति के नाम पर किसी भी प्रेमी को मार डालना सही है अपना राय कॉमेंट मे जरूर बताइए।







0 टिप्पणियाँ