एक बदनसीब लड़की की दर्द भरी कहानी | very emotional Hindi story
यह दर्दभरी कहानी है एक लड़की की या फिर यूं कहूं तो भी गलत ना होगा कि यह कहानी है एक बदनसीब लड़की की।वैसे इस दुनिया में लड़की होना ही जीवन को काफी कठिन बना देता है और जब आप दिखने में अच्छे ना हो, पढ़ाई लिखाई में भी अच्छे ना हो तब सोचिए कठिनाई का लेवल क्या होता होगा।
संध्या बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में कमजोर थी। रंग उसका सावला था। नाक नक्शा भी बाकी लड़कियों की तुलना में इतना खास न था। ऊपर से भगवान ने दातों की बनावट भी टेढ़ी-मेढ़ी दी थी।
जब संध्या छोटी थी तो बचपन में स्कूल के बच्चे चिढ़ाते। बडी हुई तो गली मोहल्ले के लोग उसे देख कर मुंह फेर लिया करते। कोई भी उसका दोस्त बनने के लिए तैयार न था उसके रिश्तेदार भी कुछ खास उसे भाव दिया ना करते। बस एक उसकी मां ही थी जिसे उसके सूरत या लुक्स से कोई फर्क नहीं पड़ता।
मां संध्या से और संध्या मां से बेहद प्यार करते। दुनिया भर की आलोचनाओं को सहने की शक्ति थी मां, संध्या के लिए। जब कोई उसे डफर बोल देता या जब कोई उसे बदसूरत बोल देता,जब संध्या को शादी के लिए देखने आए लोग उसे बिना पसंद किए लोट जाते, यहां तक की जब खुद के पापा ही उसे मनहूस बोल देते तब मा ही तो थी जो उसे समझाती की लोगों के बोलने से क्या होता है? तू तो मेरी प्यारी बेटी है!
भगवान के किए इतने सारे अन्यायो के बावजूद संध्या जीना सीख गई थी। वह खुश रहना सीख गई थी। जो भी गिने-चुने लोग उससे बातें करते,उन्हें चुटकुले सुना कर हंसाया करती और खुद भी ठहाके लगाकर हंसा करती। इसके अलावा एक और बहुत बड़ी खूबी थी संध्या की उसे खाना बनाने में बहुत मजा आता था। और ना सिर्फ खाना बनाने में मजा आता था, उसका बनाया खाना खाकर लोगों को जो स्वाद आता था वह उन को तृप्त कर जाता था। और यह उसमें अपने आप तो नहीं आया था दुनिया के ठुकराए जाने के बाद उसने अपना सारा समय खाने की रेसिपीज की किताबें, रेडियो शोस और टीवी चैनल्स को समर्पित कर दिए थे।
संध्या की तारीफ तो कोई भी नही करता लेकिन उसके हाथों के बने खाने की तारीफ वह हर व्यक्ति करता जो उसे चखता। इस 1 गुण की वजह से संध्या अपने आजू-बाजू की औरतों में फेमस हो गई थी। क्योंकि जिसे भी खाना पकाना सीखना हो या कुछ नया पकवान बनाना सीखना हो तो वह संध्या के पास आती और संध्या भी खुशी-खुशी उन्हें सब सिखाती। उसके पास आने वाली औरते अच्छा खाना बनाना सीख जाती लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी संध्या के हाथों का वह जादू जो सबको तृप्त कर जाता वह कोई ना सीख पाता।
संध्या की जिंदगी इन्ही उतार-चढ़ावो के साथ कट रही थी। एक बार फिर से मां बाप ने जीतोड़ कोशिश कर एक फैमिली को संध्या को देखने के लिए मना लिया था और अगले दिन लड़का संध्या को देखने आने वाला था। संध्या को इस बात की खबर होने पर वह दुखी और गुस्सा हो गई थी कि बिना उससे पूछे, पता नहीं क्यों मां बाप लड़कों को बुला लेते थे और उसका मजाक बना देते थे। मां ने संध्या को समझाया था की ऐसा ही होता है कोई भी बेटी अपने मां-बाप के यहां हमेशा नहीं रहती उसे एक दिन शादी करके जाना ही पड़ता है।
अगले दिन संध्या सुबह-सुबह ही लड़के वालों के आने से पहले ही सज सवरकर कहीं निकल गई थी। उस दिन लड़के वाले घर आकर मां बाप को बहुत खरी-खोटी सुनाकर गए थे। वैसे भी पापा को संध्या पर हमेशा ही गुस्सा रहता था लेकिन उसकी इस हरकत ने उनको गुस्से से पागल कर दिया। उस दिन पापा ने संध्या का सारा गुस्सा मां पर उतार दिया था यह कहकर कि एक मनहूस बेटी को जन्म देकर भी तुम्हारा मन नहीं भरा था इसलिए उसको लाड प्यार देकर सर पर बिठा लिया है।
हमेशा अपनी बेटी के बारे में गलत बोलने वालों से नाराज रहने वाली मां आज खुद संध्या से नाराज हो गई थी। और वह अब संध्या के घर वापस आने की बेसब्री से राह देख रही थी ताकि अपना गुस्सा उस पर उतार सकें।
सूरज ढलने से पहले संध्या घर लौट आई थी उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी, हाथों में एक चेक था और एक सर्टिफिकेट भी। संध्या मां से कुछ कहना चाहती थी लेकिन इससे पहले कि संध्या अपने मुंह से एक भी शब्द कह पाती, मां ने उसे खरी खोटी सुनाना शुरू कर दिया। गुस्से में मां बोलते बोलते इतना कुछ बोल गई की को संध्या ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मां ने कहा बाकी सभी लोग सही थे तुम सच में मनहूस हो। तुम्हारी वजह से हर कोई परेशान है। अच्छा होता जो तुम पैदा होते ही मर जाती यह दिन ना देखना पड़ता हमे।
गुस्से में बड़बड़ाती और सब्जियां काट रही मां ने एक बार भी संध्या की तरफ नहीं देखा था। संध्या मां की बातें किसी पत्थर की मूरत की तरह सुन रही थी। पत्थर की ऐसी मूरत जिसके शरीर में तो जान ना हो लेकिन आंखों से आंसुओं की धारा बह रही हो। संध्या ने मां से पूछा,"मां क्या सच में तुम भी चाहती हो कि मैं मर जाऊं? क्या इतनी बुरी हूं मैं मां?"
अभी भी गुस्सा सर पर सवार होने की वजह से मां ने कह दिया,"हां।"
बिना एक पल भी सोचे संध्याने सीधा अपने कमरे में जाकर कमरा अंदर से बंद कर लिया था। एक दो मिनट बाद गुस्सा थोड़ा शांत होने पर मां को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो संध्या के रूम के तरफ गई। उन्हे पता चला कि संध्याने रूम को अंदर से बंद कर लिया है। गुस्से में कुछ कर ना ले इसलिए माने तुरंत पापा को इस बात की खबर दी। दोनों ने काफी दरवाजा खोलने की कोशिश की लेकिन जब नाकामयाबहे तो दरवाजा तोड़ दिया।
अपने स्कार्फ से फांसी का फंदा तैयार कर संध्या पंखे से लटक रही थी! ज्यादा वक्त नहीं हुआ था वह सिर्फ बेहोश हुई थी! मां पापा ने तुरंत उसे पंखे से अलग किया और बेड पर लेटाया। पापा ने तुरंत डॉक्टर को फोन किया, तब मां का ध्यान बेहोश पड़ी संध्या के हाथ में पकड़ी एक चिट्ठी और पास ही में पड़े पांच लाख के चेक और फाइव स्टार होटल में शेफ की नोकरी के लिए कन्फर्मेशन लेटर पर पड़ी जो संध्या अपने साथ लाई थी।
मां और पापा ने वह चिट्ठी खोलकर पढ़ी जो उसने अभी-अभी लिखी थी। चिट्ठी कुछ इस प्रकार थी..
मम्मी और पापा मैं जानती हूं मेरे जन्म से लेकर आज के दिन तक मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिस पर आप गर्व कर सके। लेकिन मैं आपको बताना चाहती थी कि आज मैं खाना पकाने के नेशनल लेवल कंपटीशन को जीत चुकी हूं और यह 5 लाख का चैक मुझे प्रथम स्थान पर आने के लिए मिला था।
जजीस को मेरा खाना इतना पसंद आया था कि उन्होंने मुझे एक बहुत बड़े होटल में बतौर मास्टर शेफ की नौकरी के लिए कंफर्मेशन लेटर ही दे दिया था।
पूरी दुनिया मेरे खिलाफ है मुझे इस बात का कभी भी फर्क पड़ा ही नहीं था और ना ही बाबूजी की कड़वी बातें मैंने अपने दिल पर ली थी क्योंकि मैं जानती थी बाहर से सख्त दिखते मेरे बाबूजी अंदर से तो मुझे प्यार ही करते थे। प्यार ना करते होते तो बिना मांगे मुझे कपड़े, मिठाइयां, पटाखे ये सब ना लाकर देते।
मां के प्यार को कोई क्या बयां कर सकता है। मेरी मां मेरे लिए मेरी सारी दुनिया थी। जब मां मेरे साथ होती तो मुझे किसी बात की परवाह ना होती थी। मेरी मां मेरी थी इसलिए मुझे किसी और की जरूरत ना थी। मेरी मां मेरे साथ नहीं है तो मेरी दुनिया मेरे साथ नहीं है इसलिए मैं आज दुनिया को ही अलविदा कह कर जा रही हूं।
मैं जानती हु आपने कभी ना कभी भगवान से यह दुआ जरूर मांगी होगी कि अगले जन्म में मेरे जैसी औलाद ना मिले लेकिन मैं हमेशा यह प्रार्थना करती थी कि अगले जन्म में तो क्या मेरे हर जन्म में मुझे आप जैसे ही माता-पिता मिले और आज भी यही प्रार्थना करके उसी भगवान के पास जा रही हूं।"
चिट्ठी पढ़ते पढ़ते मां और पापा सर से पांव तक पछतावे में डूब गए थे और बेहोश पड़ी संध्या के सर पर हाथ फेरते हुए फूट-फूट कर रो रहे थे।
दोस्तों, पूरी कहानी पढ़ने के लिए धन्यवाद मैं जानता हूं यह कहानी आपके दिल को छू गई है। मैं उम्मीद कर सकता हूं कि अब आप जाने अनजाने में किसी भी व्यक्ति का उसके बाहरी लुक्स की वजह से दिल नहीं दुखायेंगे।




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