छत्तीसगढ़ :
प्राचीन इतिहास (5 लाख
ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व)
✓प्रागऐतिहासिक काल
(10000ईसा पूर्व से 3000
ईसा पूर्व तक):
ऐसा समय जिसमें लेखन कला का विकास नहीं हुआ था, केवल शैल चित्रों के रुप में साक्ष्य मिले हैं, प्राग ऐतिहासिक काल कहलाता है।
प्रागौतिहासिक काल के अधिकतर प्रमाण उत्तर छत्तीसगढ़ से प्राप्त हुई। प्रागौतिहासिक काल को पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने "मानव जाती की सभ्यता का जन्म स्थान माना है " इसका प्रमाण प्राचीनतम आदिवासी क्षेत्रो से प्राप्त हुई है।
यहाँ के गुफाओ एवं शैल चित्रों के रूप में अपना प्राचीनतम स्मृति का ज्ञान कराती है। यहाँ की गुफाओ में उकेरे गए शैल चिंत्रो की खोज सबसे पहले इंजिनियर अमरनाथ दत्त ने 1910 में किया था सिंघनपुर की गुफाओ में लालरंग से पशुओ और सरीसृपों चिन्हो का रूपांकन है जिसमे मनुष्य के चिंत्रों को रेखा के द्वारा खिंच कर बनाया गया है।
1) पूर्व पाषाण काल
2) मध्य पाषाण काल
3) उत्तर पाषाण काल
4) नवपाषाण काल
√ पूर्व पाषाण काल:
छत्तीसगढ़ के महानदी घाटी से पत्थर के हस्त चलित कुदाल और शिंघनपुर गुफा (रायगढ़) से भी पूर्व पाषाण काल का साक्ष्य मिला है।
√मध्य पाषाण काल:
मध्य पाषाण काल का साक्ष्य सबसे ज्यादा कबरा पहाड़ (रायगढ़) से मिला हैं , यहां से औजार तथा छिपकली, घड़ियाल, सांभर की लाल रंग की चित्रकारी मिली है।
√उत्तर पाषाण काल:
उतर पाषाण काल का साक्ष्य धनपुर (बिलासपुर) से ,महानदी घाटी, बिलासपुर जिले के धनपुर तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर में स्थित चित्रित शैलाश्रय के निकट से उत्तर पाषाण काल के लघुकृत पाषाण औजार प्राप्त हुए है।
√नव पाषाण काल :
नव पाषाण काल में छिद्रित घन जैसे औजार दुर्ग जिले के अर्जुनी, राजनांदगांव के चितवाडोंगरी तथा रायगढ़ जिले के टेरम नामक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।
छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक
काल के प्राप्त साक्ष्य:
पाषाण घेरे:
• बालोद के करहिभदर, चिरचारी, सोरर से शव को दफना कर बड़े पत्थरों से ढक दिया जाता था।
• कोंडागांव के गढ़धनोरा में मध्य पाषाण युगीन 500 स्मारक प्राप्त हुए हैं। इसकी खोज रमेन्द्र नाथ मिश्र व कामले ने किया है।
शैल चित्र:
• कबरापहाड़ (रायगढ़)-सर्वाधिक शैल चित्र प्राप्त हुए है।
लोहे का साक्ष्य:
• बालोद जिले के करहिभदर, चिरचारी, सोरर, करकाभाठा से लोहे के औजार व मृदभांड प्राप्त हुआ है।
काष्ठ स्तम्भ :
वीर नायकों के सम्मान में बस्तर क्षेत्र से अनेक काष्ठ स्तम्भ प्राप्त हुए है जो कि उनके सम्मान मे स्थापित किए गये थे जो हैः मसेनार डिलामिली, चित्रकूट किलेपाल, चिंगेनार आदि से स्मारक प्राप्त हुए है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
• सबसे लंबी गुफा बोतल्दा की गुफा हैं।
• सर्वाधिक शैल चित्र कबरापहाड़ की गुफा से प्राप्त हुई है।
• सर्वाधिक जानकारी कबरा पहाड़ की गुफा से प्राप्त हुई है।
• प्रागैतिहासिक काल के सर्वाधिक शैलचित्र रायगढ़ जिले में मिले हैं
• प्रागैतिहासिक सबसे प्राचीन गुफा सिंघनपुर की गुफा फिर कबरा पहाड़ की गुफा है।
• छत्तीसगढ़ के शैल चित्रों की खोज सर्वप्रथम 1910 में अंग्रेज इतिहासकार एंडरसन ने किया था।
• नवपाषाणिक अवशेषों की सर्वप्रथम जानकारी डॉक्टर रविंद्र नाथ मिश्रा डॉक्टर भगवान सिंह ने दिया।
विस्तार से स्थल के बारे में:
जोगीमारा गुफा :
जोगीमरा गुफा जो संसगुजा के समीप रामगढ़ पहाड़ी में रिथत है, जहाँ से अधिकांश चित्र खेरूए रंग के प्राप्त हुए है, जिनमें मुख्य पशु – पक्षी, वृक्ष आदि के साथ सामाजिक जीवन की अभिव्यकित के चित्र मिलते है, इनका काल ईसापूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी मना जाता है।
सिंधनुर तथा कबरा पहाड :
रायगढ़ के इन स्थानों से शैलचित्र की प्राप्ति हुई है जो है : सिंघनपुर से लाल रंग की चित्रकारी, जिनमें शिकार दृश्य का अंकन मिला है, तथा मानव आकृतियाँ, सीधी डंड़े के आकार की तथा सीढ़ी के आकार में अंक्ति की गई है।
कबरा पहाड़ –
यहाँ से भी लाल रंग से विभिन्न चित्र प्राप्त हुए है जो है : छिपकिली, धाड़ियाल, सांभर, अन्य पशुओं तथा पंक्ति बद्ध मानव समूह सहित प्रतीकात्मक चित्रांकन किया है।
राजनादगाँव के चितवाडोंगरी –
इन सभी क्षेत्र से जोगीमारा गुफाओ में शैल चित्रों की प्राप्ति हुई है जो हैः – रयगढ़ के समीप बसनाझर, ओंगना, करमागढ़ तथा लेखापाडा, सगुजा के समीप रामगढ़ पहाडी से प्राप्त हुए है।
बिलासुपर जिले के धनपुर तथा रायगढ़ जिले के सिंधनपुर में स्थित चित्रित शैलाक्षय के निकट से उत्तर पाषाण युग लघुकृत पाष्ण औजार प्राप्त हुए है।






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